भगत सिंह और उनकी अधूरी क्रांति
तो आज भगत सिंह का जन्मदिन है.. बहुत सारे लोग अपनी डीपी और स्टेटस में भगत सिंह की फ़ोटो लगाएंगे..
क्योंकि वो सोचते हैं भगतसिंह एक उग्र क्रांतिकारी थे और उन्होंने आज़ादी के लिए जान दी थी.. पर क्या सच में उन्होंने सोचा था कि फांसी पर चढ़ूंगा तो अंग्रेज़ आज़ाद कर देंगे?? देश सुखी और सम्पन्न होगा?? क्या इतना ही मकसद था उनका अपनी जान न्यौछावर करने का...
नहीं .. बिल्कुल नही.. उनके फांसी पर चढ़ने का उनका मकसद आज भी अधूरा है....
आज के युवा जिनमें भगत सिंह क्रांति की आग पैदा करना चाहते थे ताकि इस देश का हित हो किसी के साथ अन्याय न हो सबको बराबरी का हक मिले.. उन युवाओं के पास TikTok पर वीडियो बनाने के लिए तो समय है..Instagram.. Facebook .. पर बेमतलब अतार्किक समाजविरोधी जनविरोधी शांतिविरोधी और उत्तेजना में लोगो को गालियां देने का तो पर्याप्त समय है पर भगतसिंह सिंह जैसे महान गंभीर विचारकों के लिए समय नही है इस ब्लॉग को भी शायद ही कोई पूरा पढ़े क्योंकि ये बहुत पकाऊ है इतिहास पर गौर करने की हिम्मत नही है क्योंकि इतिहास उनकी विचारधारा के खिलाफ भी हो सकता है जो कि पसन्द नही आएगा वो मज़ा नही देगा जो उत्तेजना के साथ गालियां देने में आता है.. उन्हें लगता है भगत सिंह का सफर सिर्फ आज़ादी तक था..आज के युवाओं ने उनकी क्रांतिकारी छवि को तो अमर कर दिया पर विचारों और उनकी विचारधारा को मरने दिया .. बड़े विश्वास से मैं कहता हूँ कि गिनती के कुछ ही लोग होंगे जिन्होंने कभी भगत सिंह को जानने के बजाए.. उन्हें समझने की कोशिश की होगी..
मेरी नज़र में भगत सिंह के लिए सम्मान इसलिए नही है क्योंकि उन्होंने आज़ादी के लिए जान दी... इतिहास देखोगे तो आज़ादी की क्रांति में तो कई और भी बाँकुरे है जिन्होंने 20 साल के अंदर ही अपनी जान देश पर कुर्बान कर दी जिनकी शायद ही कोई अपनी प्रोफाइल पिक्चर में फ़ोटो लगाता हो..
खैर.. मैं प्रशंषक उनकी विचारधारा का हूँ उनकी तार्किक क्षमता का हूँ उनके सोचने के तरीके का हूँ जो काफी हद तक मुझसे मेल खाता है मैं इसके लिए खुद पर सीमित गर्व भी महसूस करता हूँ... सीमित गर्व इसीलिए क्योंकि गर्व आपको अपनी कमियां को नज़रअंदाज़ करवा देता है और आपको आगे का मुक़ाम हासिल करने से रोकता है मैं देखता हूँ कि भारतीय हर चीज़ पर गर्व महसूस करते है..करिये एक सुखद एहसास होता है अच्छी बात है पर आगे एक "सीमित" शब्द लगा लीजिये ताकि प्रगति रुके ना आपका लक्ष्य सिमट के ना रह जाये...
भगत सिंह का ही एक कथन है कि "यदि आप सोलह आने के लिये लड़ रहे हैं और एक आना मिल जाता है, तो वह एक आना ज़ेब में डाल कर बाकी पन्द्रह आने के लिये फिर जंग छेड़ दीजिए"...आज जंग है मानवता का अधिकार.. समानता का अधिकार..एक अच्छी जीवनशैली का अधिकार.. ये जंग सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए नही पूरे जनसमाज के हित के लिए है..
वो पिछड़ा सामाजिक वर्ग जिसे पसीने पोछने का पर्याप्त समय नही मिलता..उसके सुलभ जीवन के लिए है.. उसकी जंग का नेतृत्व आपको ही करना है उसे लड़ने की फुरसत नही है..
इसके लिए किसी रणभूमि में नही उतरना है बस उनकी आवाज़ आपको बनना है.. शीर्षस्थ लोगो तक आपको उनकी समस्याएं पहूंचानी है पर अफसोस कि बात है कि आज कोई अपनी आवाज़ भी उठाता है तो आप ही आँखे तान देते हो..
खैर.. मैं मानता हूँ भगतसिंह जी सिर्फ आज़ादी के लिए लड़ने वाले क्रांतिकारियों के जत्थे में ही नही थे बल्कि कुछ अलग हटकर एक अनूठी श्रेष्ठ विचारधारा... मेधावी तर्क शक्ति..नैतिकता एवं आदर्शों के भी धनी थे और ये उनके क्रिया कलापों एवं कई सारे लेखों में झलकता है...देखने को लोग उन्हें एक उग्र चरमपंथी की तरह देखते है पर उनके कई पत्रों में उन्होने जिस शांत लहज़े से "प्यारे दोस्त" बोलकर संबोधन किया है ये उनके शांत सहज स्वभाव को दर्शाता है.. वे गांधी जी के अहिंसा से आज़ादी प्राप्त करने से असहमत जरूर थे और उन्होंने पूरी तरह हिंसा पर भी जोर नही दिया है अहिंसा और हिंसा का बड़ा ही संतुलित रूप उनके विचारों और उनके लेखों में मिलता है.. भगतसिंह एक क्रांतिकारी के साथ एक महान बुद्धिजीवी भी थे..अंग्रेज़ी हुकूमत के अलावा उन्होने अगर किसी दल या किसी व्यक्तिविशेष की आलोचना भी की है तो बड़े ही चुने हुए शब्दों से एवं सहजता से की है एवं उसके पीछे का तर्क दिया है और इनके लेखों में कहीं भी घृणा का भाव नही मिलता है..
मैंने ऊपर एक वाक्य कहा की भगतसिंह जी का मकसद अधूरा रह गया है तो वो क्या है?
वो मकसद जानने से पहले ये समझना होगा कि आख़िर "क्रांति" क्या है..
क्रांति के क्रम में आज़ादी शामिल हो सकती है पर क्रांति का मतलब आज़ादी नही होता.. बल्कि एक वख़्त से चल रही व्यवस्था या कार्यपद्धति में प्रगति के लिए त्वरित बदलाव होता है
भगतसिंह चाहते थे उनकी शहादत के बाद लोगों की सोच में 'क्रांति' के लिए एक जज़्बा उत्पन्न हो..जो जज़्बा अंग्रेज़ी हुकूमत को तो जड़ से उखाड़ फेंके ही फेंके साथ मे रूढ़िवादी मानसिक गुलामी से भी बाहर निकलर प्रगतिवादी सोच की तरफ लोगों को बढ़ाये... आडम्बरो पाखण्डों में फसें लोगों को बाहर निकालकर सामाजिक अधिकारों की मांग के लिए प्रेरित करे...मजदूरों मजलूमों के बारे में सोच पैदा करे..युवा उनकी आवाज उठाये एक सभ्य समाज की स्थापना की ओर बढ़े..
यानी कि आज़ादी तो सिर्फ अंगेज़ों से मिली देश को पर उस विकसित भारत की स्थापना हुई ही कहाँ? जिस भारत की दृढ़ इच्छा उनके लेखों में झलकती है...
आज़ादी मिली फिर लोगों ने उनकी उस सोंच को तो 1947 के बाद कहीं भूला ही दिया...सरकारें उनसे डरती थी डरती है और डरती रहेंगी क्योंकि सरकार कभी नही चाहेगी की जनसामान्य में भगतसिंह की वो क्रांतिकारी विचारधारा फैले और लोग अपने अधिकारों की मांग करें..किसी से नही छुपा है कि छोटे छोटे कार्यालयों में भ्रष्टाचार होता है.. तो बड़े बड़े विभागों की तो भनक भी नही लगती..सरकारे गैर जरूरी चीज़ों में पैसे बर्बाद करती है एक रुपये की जगह 20 रुपये का खर्च दिखाती है..ये सब पैसा कैसा है... ये सारा पैसा अगर उन मजदूरों तक पहुँचे जो सुबह से शाम तक बोझा ढोते है फिर भी चैन की रोटी नही खा पाते तो उनकी ज़िन्दगी में कितना चैन होगा... सड़को पर भीख माँगते बच्चों को उन पैसों से अच्छी शिक्षा मिले तो ये देश कितना आगे बढ़ेगा.. मेरी तरह कई ऐसे युवा है जिनको ज़िन्दगी की जद्दोजहद से निपटने के लिए पैसे की कमी के कारण अपनी आगे की पढ़ाई छोड़नी पड़ती है अगर ये पढ़ाई पूरी हो पाए तो शायद देश की दशा कुछ और हो.. सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं की कमियों से मर रहे लोगों..दयनीय हालतो से निपटा जा सकता है.. फुटपाथों पर सो रहे भुखमरी गरीबी से मर रहे लोगो के अगर वो पैसा काम आए.. उच्च स्तर की पढ़ाई के लिए लोगो को विदेशों के रुख न करना पड़े यहीं अच्छे विश्वविद्यालय हो..तो आज जो हम लगभग हर सूचकांक में निचले स्तर पर रहते है शायद उनमें ऊपर हो..
हो सकता है आज सरकार हमारी विचारधारा से अलग है कल शायद हमारे सामान विचारधारा वाली हो.. पर क्या हमारा स्टैंड हमारा कर्तव्य बदल जाना चाहिए?
अगर आप मे सच्चे आदर्श हैं कोई स्वाभिमान है सिद्धांत हैं तब तो बिल्कुल नही बदलना चाहिए...
सिर्फ आज़ादी आयी है आज़ादी के 70 सालो बाद आज भी हम बहुत पीछे हैं..और इसमें सरकारें जितनी जिम्मेदार है उतने हम भी हैं हमने इन चीज़ों के खिलाफ कभी क्रांति की ही नही... इसीलिए भारत जैसा महान देश आज भी विकासशील देशों में गिना जाता है..
अगर भगतसिंह के लिए और देश के लिए मिटने वाले.. उन हज़ारो क्रांतिकारियों..और शहीदो के लिए हल्की सी भी सच्ची भावना है मन में...तो निश्चय करो कि प्रगतिवादी सोंच अपनाओगे..तर्क करना सीखोगे..सही गलत में फर्क करना सीखोगे...सरकार कोई भी हो आप जनता और समाज के ही रहोगे... उनकी आवाज दबने नही दोगे बल्कि ऊपर उठाओगे... अन्याय और जुर्म को बरदाश्त नही करोगे...भीड़ के जुल्म को मोबाइल में कैद करके मज़े लूटने के बजाए सावधानी के साथ उनको सबक सिखाओगे...
पर ये सब तब कर पाओगे जब आप खुद में आदर्श लाओगे.. खुद में स्वाभिमान जगाओगे... इतिहास पढोगे..जिन्हें अब तक बुरा मानते आए हो उनकी सच्चाई जानने की कोशिश करोगे.. सोशल मीडिया व्हाट्सएप्प के चंगुल से निकलकर सच को जानने की अपने अंदर लालसा जगाओगे..(बात मानो सच कितना भी कड़वा हो कितना भी निराशाजनक हो कितना भी नकारात्मक हो पर जो सुकून और एहसास सच को जान लेने में मिलता है.. वो दुनिया की किसी भी चीज़ में नही... सच एक नशा है कड़वा है पर करके देखो आदत लग जाएगी उसूलों की....)और सबसे जरूरी "सवाल करोगे" दिक्कत ये है कि लोग सवाल नही करते सालों से जो परम्परा चली आ रही है वो सही हो या गलत ऐसे ही चलती रहती है इनपर सवाल करो.. दुसरो से करने से पहले खुद से करो जवाब ढूँढो तर्कों से ढूँढो तथ्यों से ढूँढो वैज्ञानिक तरीकों से ढूँढो सही लगे तब फ़ॉलो करो न लगे तो सहजता से आलोचना करो अपना पक्ष सामने रखो और दूसरों से जवाब मांगो और खुद के पक्ष में बदलाव की संभावना रखो...
आप अगर पंथ (जिसे आप धर्म कहते हो) और जाति की ऊंच नीच भरी सोच से ऊपर नही उठ पा रहे हो तो उसे अपनी कल्पनाओं के माध्यम से आखिरी निर्णय तक ले जाओ और फिर सोचों की क्या अंततः इसका परिणाम सच मे देश दुनिया या मानवजाति के लिए ठीक होगा? जिसे आप बहुत प्यार करते हो उसे देश के भविष्य के हित में है? क्योंकि अगर नही सोचोगे और नादानी में उत्तेजना में जगह जगह नफरत फैलाओगे तो आप इस देशको खोखला करने में भागीदार रहोगे.. सभी पंथों में तरह तरह की कुरीतियां है पर आपको दूसरे पंथों की कुरीतियां तो दिखती हैं पर अपने पंथ की नहीं दिखती..फिर अगर सामने वाला आपके पंथ में फैली कुरीतियों पर सवाल करेगा तो आपको उसका तर्क चुभ जाएगा..और आप बंदूके तान डोगे. दंगे करोगे फसाद करोगे आग लगाओ के देश को ... ये सब करने से पहले तर्क करो मानसिक गुलामी से आज़ाद हो..नही है हिम्मत तो मत बनो नास्तिक मगर शांति की ओर बढ़ो..
आज़ाद हो आज पर अंग्रेज़ जो बो गए है उनके कांटे आप खुद की सोच में लपेटकर देश को जाने अनजाने जगह जगह चुभा रहे हो...इससे आज़ाद हो.. आज भी एक क्रांति की जरूरत है.. हाथ जोड़कर कहता हूँ .. भगतसिंह की विचारधारा को मरने मत दो.. परसो मेरी एक महत्वपूर्ण परीक्षा है और मैं ये लेख लिख रहा हूँ.. पता नही क्यों.. ये मेरी ज़िंदगी या देश में बहुत कुछ बदलेगा नही बस एक सुकून देगा कि मैंने औरो की तरह भगतसिंह के विचारों को यूँ ही मरने नही छोड़ा...
और अंत मे उनके आखिरी समय का वो छोटा सा किस्सा..जिसे मैं जब भी पड़ता हूँ तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते है..कल्पना करो कितना जज़्बा..कितना जुनून लगा होगा.. कितना स्वाभिमान लगा होगा.. कितनी देर तक दांतो में वो टीस लगी होगी .. जब जीते जी एक इंसान स्वेछा से मौत को गले लगाने जा रहा है 23 साल की उम्र में उसके आँखों के सामने वो मंज़र क्या रहा होगा... चेहरे पर वो हँसी शायद ऐसी रही हो जो.. दुनिया जीत लेने से भी हासिल ना हो... कानों में शायद वो शोर रहा हो जो ब्रह्मांड में गूंजता है...
23 मार्च को भगत सिंह को फांसी दिए जाने से दो घंटे पहले उनके वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिले थे। उन्होंने बाद में लिखा कि भगत सिंह अपनी छोटी सी कोठरी में पिंजड़े में बंद शेर की तरह चक्कर लगा रहे थे.
‘इंक़लाब ज़िदाबाद!’
भगत सिंह ने मुस्करा कर उनके वकील प्राण नाथ मेहता का स्वागत किया और पूछा कि आप मेरी किताब ‘रिवॉल्युशनरी लेनिन’ लाए या नहीं ?
जब मेहता ने उन्हे किताब दी तो वो उसे उसी समय पढ़ने लगे मानो उनके पास अब ज़्यादा समय न बचा हो ..
मेहता जी ने उनसे पूछा कि क्या आप देश को कोई संदेश देना चाहेंगे?
भगत सिंह ने किताब से अपना मुंह हटाए बग़ैर कहा, “सिर्फ़ दो संदेश… साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और ‘इन्क़लाब ज़िदाबाद !”
इसके बाद भगत सिंह ने मेहता से कहा कि वो पंडित नेहरू और सुभाष बोस को उनका धन्यवाद पहुंचा दें, जिन्होंने उनके केस में गहरी रुचि ली ...
मेहता के जाने के थोड़ी देर बाद जेल अफ़सरों ने तीनों क्रांतिकारियों को बता दिया कि उनको वक़्त से 12 घंटे पहले ही फांसी दी जा रही है। अगले दिन सुबह छह बजे की बजाय उन्हें उसी शाम सात बजे फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा....
जब यह ख़बर भगत सिंह को दी गई तो वे मेहता द्वारा दी गई किताब के कुछ पन्ने ही पढ़ पाए थे. उनके मुंह से निकला, ” क्या मुझे लेनिन की किताब का एक अध्याय भी ख़त्म नहीं करने देंगे ? ज़रा एक क्रांतिकारी की दूसरे क्रांतिकारी से मुलाक़ात तो ख़त्म होने दो” फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले "ठीक है अब चलो"
पूरा किस्सा यहां पढ़ें 👇
https://www.bbc.com/hindi/india-39352944
जब से सुना है मरने का नाम जिन्दगी है
सर पे कफन लपेटे कातिल को ढूँढ़ते हैं ...
भगतसिंह जी के कुछ लेख इस अर्काइव में है 👇पढ़ सकते हैं
bit.ly/2nfZJyq
क्योंकि वो सोचते हैं भगतसिंह एक उग्र क्रांतिकारी थे और उन्होंने आज़ादी के लिए जान दी थी.. पर क्या सच में उन्होंने सोचा था कि फांसी पर चढ़ूंगा तो अंग्रेज़ आज़ाद कर देंगे?? देश सुखी और सम्पन्न होगा?? क्या इतना ही मकसद था उनका अपनी जान न्यौछावर करने का...
नहीं .. बिल्कुल नही.. उनके फांसी पर चढ़ने का उनका मकसद आज भी अधूरा है....
आज के युवा जिनमें भगत सिंह क्रांति की आग पैदा करना चाहते थे ताकि इस देश का हित हो किसी के साथ अन्याय न हो सबको बराबरी का हक मिले.. उन युवाओं के पास TikTok पर वीडियो बनाने के लिए तो समय है..Instagram.. Facebook .. पर बेमतलब अतार्किक समाजविरोधी जनविरोधी शांतिविरोधी और उत्तेजना में लोगो को गालियां देने का तो पर्याप्त समय है पर भगतसिंह सिंह जैसे महान गंभीर विचारकों के लिए समय नही है इस ब्लॉग को भी शायद ही कोई पूरा पढ़े क्योंकि ये बहुत पकाऊ है इतिहास पर गौर करने की हिम्मत नही है क्योंकि इतिहास उनकी विचारधारा के खिलाफ भी हो सकता है जो कि पसन्द नही आएगा वो मज़ा नही देगा जो उत्तेजना के साथ गालियां देने में आता है.. उन्हें लगता है भगत सिंह का सफर सिर्फ आज़ादी तक था..आज के युवाओं ने उनकी क्रांतिकारी छवि को तो अमर कर दिया पर विचारों और उनकी विचारधारा को मरने दिया .. बड़े विश्वास से मैं कहता हूँ कि गिनती के कुछ ही लोग होंगे जिन्होंने कभी भगत सिंह को जानने के बजाए.. उन्हें समझने की कोशिश की होगी..
मेरी नज़र में भगत सिंह के लिए सम्मान इसलिए नही है क्योंकि उन्होंने आज़ादी के लिए जान दी... इतिहास देखोगे तो आज़ादी की क्रांति में तो कई और भी बाँकुरे है जिन्होंने 20 साल के अंदर ही अपनी जान देश पर कुर्बान कर दी जिनकी शायद ही कोई अपनी प्रोफाइल पिक्चर में फ़ोटो लगाता हो..
खैर.. मैं प्रशंषक उनकी विचारधारा का हूँ उनकी तार्किक क्षमता का हूँ उनके सोचने के तरीके का हूँ जो काफी हद तक मुझसे मेल खाता है मैं इसके लिए खुद पर सीमित गर्व भी महसूस करता हूँ... सीमित गर्व इसीलिए क्योंकि गर्व आपको अपनी कमियां को नज़रअंदाज़ करवा देता है और आपको आगे का मुक़ाम हासिल करने से रोकता है मैं देखता हूँ कि भारतीय हर चीज़ पर गर्व महसूस करते है..करिये एक सुखद एहसास होता है अच्छी बात है पर आगे एक "सीमित" शब्द लगा लीजिये ताकि प्रगति रुके ना आपका लक्ष्य सिमट के ना रह जाये...
भगत सिंह का ही एक कथन है कि "यदि आप सोलह आने के लिये लड़ रहे हैं और एक आना मिल जाता है, तो वह एक आना ज़ेब में डाल कर बाकी पन्द्रह आने के लिये फिर जंग छेड़ दीजिए"...आज जंग है मानवता का अधिकार.. समानता का अधिकार..एक अच्छी जीवनशैली का अधिकार.. ये जंग सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए नही पूरे जनसमाज के हित के लिए है..
वो पिछड़ा सामाजिक वर्ग जिसे पसीने पोछने का पर्याप्त समय नही मिलता..उसके सुलभ जीवन के लिए है.. उसकी जंग का नेतृत्व आपको ही करना है उसे लड़ने की फुरसत नही है..
इसके लिए किसी रणभूमि में नही उतरना है बस उनकी आवाज़ आपको बनना है.. शीर्षस्थ लोगो तक आपको उनकी समस्याएं पहूंचानी है पर अफसोस कि बात है कि आज कोई अपनी आवाज़ भी उठाता है तो आप ही आँखे तान देते हो..
खैर.. मैं मानता हूँ भगतसिंह जी सिर्फ आज़ादी के लिए लड़ने वाले क्रांतिकारियों के जत्थे में ही नही थे बल्कि कुछ अलग हटकर एक अनूठी श्रेष्ठ विचारधारा... मेधावी तर्क शक्ति..नैतिकता एवं आदर्शों के भी धनी थे और ये उनके क्रिया कलापों एवं कई सारे लेखों में झलकता है...देखने को लोग उन्हें एक उग्र चरमपंथी की तरह देखते है पर उनके कई पत्रों में उन्होने जिस शांत लहज़े से "प्यारे दोस्त" बोलकर संबोधन किया है ये उनके शांत सहज स्वभाव को दर्शाता है.. वे गांधी जी के अहिंसा से आज़ादी प्राप्त करने से असहमत जरूर थे और उन्होंने पूरी तरह हिंसा पर भी जोर नही दिया है अहिंसा और हिंसा का बड़ा ही संतुलित रूप उनके विचारों और उनके लेखों में मिलता है.. भगतसिंह एक क्रांतिकारी के साथ एक महान बुद्धिजीवी भी थे..अंग्रेज़ी हुकूमत के अलावा उन्होने अगर किसी दल या किसी व्यक्तिविशेष की आलोचना भी की है तो बड़े ही चुने हुए शब्दों से एवं सहजता से की है एवं उसके पीछे का तर्क दिया है और इनके लेखों में कहीं भी घृणा का भाव नही मिलता है..
मैंने ऊपर एक वाक्य कहा की भगतसिंह जी का मकसद अधूरा रह गया है तो वो क्या है?
वो मकसद जानने से पहले ये समझना होगा कि आख़िर "क्रांति" क्या है..
क्रांति के क्रम में आज़ादी शामिल हो सकती है पर क्रांति का मतलब आज़ादी नही होता.. बल्कि एक वख़्त से चल रही व्यवस्था या कार्यपद्धति में प्रगति के लिए त्वरित बदलाव होता है
भगतसिंह चाहते थे उनकी शहादत के बाद लोगों की सोच में 'क्रांति' के लिए एक जज़्बा उत्पन्न हो..जो जज़्बा अंग्रेज़ी हुकूमत को तो जड़ से उखाड़ फेंके ही फेंके साथ मे रूढ़िवादी मानसिक गुलामी से भी बाहर निकलर प्रगतिवादी सोच की तरफ लोगों को बढ़ाये... आडम्बरो पाखण्डों में फसें लोगों को बाहर निकालकर सामाजिक अधिकारों की मांग के लिए प्रेरित करे...मजदूरों मजलूमों के बारे में सोच पैदा करे..युवा उनकी आवाज उठाये एक सभ्य समाज की स्थापना की ओर बढ़े..
यानी कि आज़ादी तो सिर्फ अंगेज़ों से मिली देश को पर उस विकसित भारत की स्थापना हुई ही कहाँ? जिस भारत की दृढ़ इच्छा उनके लेखों में झलकती है...
आज़ादी मिली फिर लोगों ने उनकी उस सोंच को तो 1947 के बाद कहीं भूला ही दिया...सरकारें उनसे डरती थी डरती है और डरती रहेंगी क्योंकि सरकार कभी नही चाहेगी की जनसामान्य में भगतसिंह की वो क्रांतिकारी विचारधारा फैले और लोग अपने अधिकारों की मांग करें..किसी से नही छुपा है कि छोटे छोटे कार्यालयों में भ्रष्टाचार होता है.. तो बड़े बड़े विभागों की तो भनक भी नही लगती..सरकारे गैर जरूरी चीज़ों में पैसे बर्बाद करती है एक रुपये की जगह 20 रुपये का खर्च दिखाती है..ये सब पैसा कैसा है... ये सारा पैसा अगर उन मजदूरों तक पहुँचे जो सुबह से शाम तक बोझा ढोते है फिर भी चैन की रोटी नही खा पाते तो उनकी ज़िन्दगी में कितना चैन होगा... सड़को पर भीख माँगते बच्चों को उन पैसों से अच्छी शिक्षा मिले तो ये देश कितना आगे बढ़ेगा.. मेरी तरह कई ऐसे युवा है जिनको ज़िन्दगी की जद्दोजहद से निपटने के लिए पैसे की कमी के कारण अपनी आगे की पढ़ाई छोड़नी पड़ती है अगर ये पढ़ाई पूरी हो पाए तो शायद देश की दशा कुछ और हो.. सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं की कमियों से मर रहे लोगों..दयनीय हालतो से निपटा जा सकता है.. फुटपाथों पर सो रहे भुखमरी गरीबी से मर रहे लोगो के अगर वो पैसा काम आए.. उच्च स्तर की पढ़ाई के लिए लोगो को विदेशों के रुख न करना पड़े यहीं अच्छे विश्वविद्यालय हो..तो आज जो हम लगभग हर सूचकांक में निचले स्तर पर रहते है शायद उनमें ऊपर हो..
हो सकता है आज सरकार हमारी विचारधारा से अलग है कल शायद हमारे सामान विचारधारा वाली हो.. पर क्या हमारा स्टैंड हमारा कर्तव्य बदल जाना चाहिए?
अगर आप मे सच्चे आदर्श हैं कोई स्वाभिमान है सिद्धांत हैं तब तो बिल्कुल नही बदलना चाहिए...
सिर्फ आज़ादी आयी है आज़ादी के 70 सालो बाद आज भी हम बहुत पीछे हैं..और इसमें सरकारें जितनी जिम्मेदार है उतने हम भी हैं हमने इन चीज़ों के खिलाफ कभी क्रांति की ही नही... इसीलिए भारत जैसा महान देश आज भी विकासशील देशों में गिना जाता है..
अगर भगतसिंह के लिए और देश के लिए मिटने वाले.. उन हज़ारो क्रांतिकारियों..और शहीदो के लिए हल्की सी भी सच्ची भावना है मन में...तो निश्चय करो कि प्रगतिवादी सोंच अपनाओगे..तर्क करना सीखोगे..सही गलत में फर्क करना सीखोगे...सरकार कोई भी हो आप जनता और समाज के ही रहोगे... उनकी आवाज दबने नही दोगे बल्कि ऊपर उठाओगे... अन्याय और जुर्म को बरदाश्त नही करोगे...भीड़ के जुल्म को मोबाइल में कैद करके मज़े लूटने के बजाए सावधानी के साथ उनको सबक सिखाओगे...
पर ये सब तब कर पाओगे जब आप खुद में आदर्श लाओगे.. खुद में स्वाभिमान जगाओगे... इतिहास पढोगे..जिन्हें अब तक बुरा मानते आए हो उनकी सच्चाई जानने की कोशिश करोगे.. सोशल मीडिया व्हाट्सएप्प के चंगुल से निकलकर सच को जानने की अपने अंदर लालसा जगाओगे..(बात मानो सच कितना भी कड़वा हो कितना भी निराशाजनक हो कितना भी नकारात्मक हो पर जो सुकून और एहसास सच को जान लेने में मिलता है.. वो दुनिया की किसी भी चीज़ में नही... सच एक नशा है कड़वा है पर करके देखो आदत लग जाएगी उसूलों की....)और सबसे जरूरी "सवाल करोगे" दिक्कत ये है कि लोग सवाल नही करते सालों से जो परम्परा चली आ रही है वो सही हो या गलत ऐसे ही चलती रहती है इनपर सवाल करो.. दुसरो से करने से पहले खुद से करो जवाब ढूँढो तर्कों से ढूँढो तथ्यों से ढूँढो वैज्ञानिक तरीकों से ढूँढो सही लगे तब फ़ॉलो करो न लगे तो सहजता से आलोचना करो अपना पक्ष सामने रखो और दूसरों से जवाब मांगो और खुद के पक्ष में बदलाव की संभावना रखो...
आप अगर पंथ (जिसे आप धर्म कहते हो) और जाति की ऊंच नीच भरी सोच से ऊपर नही उठ पा रहे हो तो उसे अपनी कल्पनाओं के माध्यम से आखिरी निर्णय तक ले जाओ और फिर सोचों की क्या अंततः इसका परिणाम सच मे देश दुनिया या मानवजाति के लिए ठीक होगा? जिसे आप बहुत प्यार करते हो उसे देश के भविष्य के हित में है? क्योंकि अगर नही सोचोगे और नादानी में उत्तेजना में जगह जगह नफरत फैलाओगे तो आप इस देशको खोखला करने में भागीदार रहोगे.. सभी पंथों में तरह तरह की कुरीतियां है पर आपको दूसरे पंथों की कुरीतियां तो दिखती हैं पर अपने पंथ की नहीं दिखती..फिर अगर सामने वाला आपके पंथ में फैली कुरीतियों पर सवाल करेगा तो आपको उसका तर्क चुभ जाएगा..और आप बंदूके तान डोगे. दंगे करोगे फसाद करोगे आग लगाओ के देश को ... ये सब करने से पहले तर्क करो मानसिक गुलामी से आज़ाद हो..नही है हिम्मत तो मत बनो नास्तिक मगर शांति की ओर बढ़ो..
आज़ाद हो आज पर अंग्रेज़ जो बो गए है उनके कांटे आप खुद की सोच में लपेटकर देश को जाने अनजाने जगह जगह चुभा रहे हो...इससे आज़ाद हो.. आज भी एक क्रांति की जरूरत है.. हाथ जोड़कर कहता हूँ .. भगतसिंह की विचारधारा को मरने मत दो.. परसो मेरी एक महत्वपूर्ण परीक्षा है और मैं ये लेख लिख रहा हूँ.. पता नही क्यों.. ये मेरी ज़िंदगी या देश में बहुत कुछ बदलेगा नही बस एक सुकून देगा कि मैंने औरो की तरह भगतसिंह के विचारों को यूँ ही मरने नही छोड़ा...
और अंत मे उनके आखिरी समय का वो छोटा सा किस्सा..जिसे मैं जब भी पड़ता हूँ तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते है..कल्पना करो कितना जज़्बा..कितना जुनून लगा होगा.. कितना स्वाभिमान लगा होगा.. कितनी देर तक दांतो में वो टीस लगी होगी .. जब जीते जी एक इंसान स्वेछा से मौत को गले लगाने जा रहा है 23 साल की उम्र में उसके आँखों के सामने वो मंज़र क्या रहा होगा... चेहरे पर वो हँसी शायद ऐसी रही हो जो.. दुनिया जीत लेने से भी हासिल ना हो... कानों में शायद वो शोर रहा हो जो ब्रह्मांड में गूंजता है...
23 मार्च को भगत सिंह को फांसी दिए जाने से दो घंटे पहले उनके वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिले थे। उन्होंने बाद में लिखा कि भगत सिंह अपनी छोटी सी कोठरी में पिंजड़े में बंद शेर की तरह चक्कर लगा रहे थे.
‘इंक़लाब ज़िदाबाद!’
भगत सिंह ने मुस्करा कर उनके वकील प्राण नाथ मेहता का स्वागत किया और पूछा कि आप मेरी किताब ‘रिवॉल्युशनरी लेनिन’ लाए या नहीं ?
जब मेहता ने उन्हे किताब दी तो वो उसे उसी समय पढ़ने लगे मानो उनके पास अब ज़्यादा समय न बचा हो ..
मेहता जी ने उनसे पूछा कि क्या आप देश को कोई संदेश देना चाहेंगे?
भगत सिंह ने किताब से अपना मुंह हटाए बग़ैर कहा, “सिर्फ़ दो संदेश… साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और ‘इन्क़लाब ज़िदाबाद !”
इसके बाद भगत सिंह ने मेहता से कहा कि वो पंडित नेहरू और सुभाष बोस को उनका धन्यवाद पहुंचा दें, जिन्होंने उनके केस में गहरी रुचि ली ...
मेहता के जाने के थोड़ी देर बाद जेल अफ़सरों ने तीनों क्रांतिकारियों को बता दिया कि उनको वक़्त से 12 घंटे पहले ही फांसी दी जा रही है। अगले दिन सुबह छह बजे की बजाय उन्हें उसी शाम सात बजे फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा....
जब यह ख़बर भगत सिंह को दी गई तो वे मेहता द्वारा दी गई किताब के कुछ पन्ने ही पढ़ पाए थे. उनके मुंह से निकला, ” क्या मुझे लेनिन की किताब का एक अध्याय भी ख़त्म नहीं करने देंगे ? ज़रा एक क्रांतिकारी की दूसरे क्रांतिकारी से मुलाक़ात तो ख़त्म होने दो” फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले "ठीक है अब चलो"
पूरा किस्सा यहां पढ़ें 👇
https://www.bbc.com/hindi/india-39352944
जब से सुना है मरने का नाम जिन्दगी है
सर पे कफन लपेटे कातिल को ढूँढ़ते हैं ...
भगतसिंह जी के कुछ लेख इस अर्काइव में है 👇पढ़ सकते हैं
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