गाँधी कौन????
तो आज वो दिन है जब कल के मानसिक तौर पर पैदा हुए दो कौड़ी के उसूलों..आदर्शों वाले लौंडे .. सोशल मीडिया के उपजे.. नफरत में पले.. फोटोशॉप्ड फ़ोटो देखदेख बड़े हुए लौंडे.. जिनकी इतनी औकात नही है कि गलत को गलत बोल सकें.. फटती है कि वो जिस भीड़ में रहते हैं वो गालियां देगी..तो गलत देखते हुए भी सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाने से बचते हैं..दबी आवाज़ में बोलते भी हैं तो बाद में सफाइयां देने मे लग जाते है..जिनकी खुद की कोई सोंच और विचारधारा नही है वो आज गांधी जी को गरियाएँगे और उस बेवकूफ गोडसे को हीरो बताएंगे..वैसे तो ये रोज़ ही होता है पर आज कुछ खासा भड़ास निकालेंगे अपनी.. Facebook.. Whatsapp..Twitter जगह जगह पर...बिना इतिहास की तरफ देखे हुए.. बिना उनकी जीवन यात्रा को पढ़े हुए .. बिना उस शख्श को समझे हुए...
जिसने भारतीय तो भारतीय दुसरे देश के लोगो यानी साउथ अफ्रीका के लोगों के लिए भी संघर्ष किया उनके हक के लिए लड़ा..अंगेज़ो के उनके साथ किये जा रहे भेदभाव अत्याचार और अन्याय के खिलाफ लड़ा..जो दसियों बार जेल गया..जिसें कुल 11 साल की सज़ा सुनाई गयी जिसमे उन्होंने कुल 6 साल से ज्यादा का वख़्त जेलों में बिताया...जो खुद भी अंग्रेज़ों के रंगभेद का शिकार हुआ.. मारा गया और प्रिटोरिया के स्टेशन पर डाल दिया गया..
पर उसने डरे बिना आंदोलन खड़ा किया..जो अच्छा खासा पढ़ा लिखा बन्दा आराम से चाहता तो सूट बूट पहनकर अंगेज़ों का वफादार बनके एक आराम की ज़िंदगी जी सकता था.. पर वो एक स्वदेशी धोती डालकर अपने देश की जनता की आवाज़ बना और उनके हक़ के लिए लड़ता रहा.. और आखिर तक सत्य और अहिंसा के मार्ग पर अडिग चलता रहा.. कई लोग उनकी नीतियों की आलोचना करते है सुभाषचंद्र बोस भी करते थे जिन्होंने गांधी जी को राष्ट्रपिता की उपाधि दी..भगतसिंह जी भी आलोचना करते थे.. पर इनसभी को पता था कि गांधी जी की नीतियां ग़लत हो सकती है पर इनकी नियत में कोई खोट नही है इसलिए उस वख़्त हर भारतीय के मन मे उनके लिए प्रेम था.. कहीं कोई घृणा का भाव नही था... जिसकी विचारधारा के आगे पूरी दुनिया नतमस्तक है...
आज उसे अपने घर में ही गालियां दी जाती है...
वो कहते हैं चरखे से आज़ादी नही आई ..क्या जानते हो उस चरखे के बारे में .. उस चरखे में इतनी ताकत थी जिसने फिरंगीयों की आधुनिक मशीनों को हिला रखा था... वो चरखा इस देश के आत्मसम्मान का प्रतीक था.. स्वदेशी आंदोलन की जान था.. आज जो दिन रात बाबा रामदेव टीवी पर कहते दिखाई देते हैं कि स्वदेशी अपनाओ..उस शख्स ने उसी चरखे के बल पर लोगो को स्वदेशी वस्तुओं की ताकत समझायी थी और उसे जनांदोलन बना कर लोगों के दिलों में उतार दिया था.. असल में वही असल देशद्रोही हैं जो उस चरखे को हीन भावना से देखते हैं...शायद उन्हें लगता हो ये देश गोले बारूद बंदूकों के दम पर आज़ाद हुआ है .. क्या लगता है अंग्रेज़ सक्षम नही थे??
अगर गोला बारूद के दम पर अंग्रेज़ों को भारत का भविष्य निर्धारित करना होता तो ना जाने और क्या हो चुका होता..
देश को आज़ादी उस शोर से..उस हुंकार से मिली है जिसमे हर एक स्वतंत्रता सेनानी हर एक क्रांतिकारी की चीख है..जो पूरी दुनिया सुन सकती थी..
पर इन गालियां देने वालों के दिमाग मे गांधी जी और अन्य लोगों के खिलाफ सालों तक धीरे धीरे ज़हर भरा गया है जो बचा खुचा काम था वो फोटोशॉप टेक्नोलॉजी और व्हाट्सएप्प के फॉरवर्डिंग ऑप्शन के मेल ने कर दिया....
समाज में फैलाये गए राजनीतिक प्रोपगेंडा को बल देने में इन सब का भी सहयोग रहा है...
आज इस देश के लोगों ने उसे नायक बना दिया है जिसने धर्मान्धता के आवेश में इस देश से इसका एक बहुत जरूरी मार्गदर्शक छीन लिया..जिसने उम्र के ढले पड़ाव पे भी..अंग्रेजों द्वारा किये गए अत्याचार..और अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठा रही और आज़ादी के लिए लड़ रही जनता के दलों का नेतृत्व बिना डरे किया...
इस देश को आज़ाद देखने के लिए जिसने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण अरसा समर्पित कर दिया... एक मामूली शख्स ने अपनी नफरत के अंधेपन में उस इंसान को मौत के घाट उतार दिया उसे आज़ादी की हवा को खुल के महसूस करने का मौका भी ना दिया...
मैंने नाथूराम गोडसे की मनोस्थिति और भावनात्मक उत्तेजना को बड़ी निष्पक्षता से समझा भी है कई बार लगता भी है कि गोडसे ने अज्ञानता और उत्तेजना में ऐसा किया ... एक अनसुलझी विचारधारा में बंध कर ऐसा किया...
पर उसकी ये नादानी और अज्ञानता इस देश को हानि पहुंचा गयी... देश को उस ज़हरीली विचारधारा के रास्ते पे ले गयी...जिससे आज ये देश ग्रसित है.. कहीं फस गया है..
क्या गलती थी गाँधी की..??
उन्होंने तो देश को दो हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव नही रखा था..?
हां उन्होंने विस्थापन रोकने के लिए जरूर कहा था...पर क्या कभी उस वख़्त मे जाकर सोचा है ..कभी जानने की कोशिश की है कि उस वख़्त के हालात क्या थे ..कभी कल्पना की है कि जब जगह जगह दंगे आगजनी.. मुस्लिम सिखों हिन्दुओ के बीच आपस मे पलायन को लेकर नरसंहार हो रहे हों तो इंसानियत के तौर पर सबसे पहला दायित्व क्या बनता है.. ??वो भारत के विभाजन के प्रस्ताव पर भी पूर्णताः सहमत नही थे.. और हां या ना का जिम्मा उनपर था भी नहीं..
फिर भी..जो देश बरसों बरस से अंग्रेज़ों की गुलामी अत्याचार अन्याय भेदभाव झेल रहा है उसके लिए हां करने के अलावा दूसरा कौन सा रास्ता बचता है??.. राज कर रहे अंग्रेज़ों को तो एक मौका चाहिए था ये कहने का की भारत के लोग अभी सक्षम नही है इस देश की कमान संभालने के लिए और फिर शायद बरसों बरस ग़ुलामी और प्रताड़ना झेलता ये देश...
एक और चीज़ गलती के तौर बढ़ा चढ़ा के बताई जाती है कि जब सरदार VB पटेल को 15 में से 12 वोट मिले थे तो गांधी जी ने नेहरु को प्रधानमंत्री क्यों बनाया..?
क्या उन्हें नेहरू से कोई लाभ था..??
उस पूरे हालात और वाक्या को ज़रा से शब्दों में अभिव्यक्त कर पाना बहुत मुश्किल हैं क्योंकि देश एक बड़ी लंबी गुलामी के दौर से लोकतंत्र की तरफ अग्रसर हुआ था यूँ ही किसी को गलत या सही ठहराने से अच्छा होगा उस वख़्त मे खोकर उन परिस्थितियों का विश्लेषण किया जाए और फिर कहा जाए कि हां ये सही या गलत हुआ..
पर ये बात सही है कि गांधी जी.. नेहरू को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे.. और ये इच्छा उन्होंने खुलेआम जाहिर भी की... वैसे गांधी जी कोई निर्णायक अध्यक्ष नही थे कांग्रेस के.. तो भले ही गांधी जी की राय से ही पर उस दल ने नेहरू को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकारा.. कोई बगावत नही हुई.. कोई खासा नाराज़गी भी नही थी.. सरदार वल्लभभाई पटेल जी के मन मे भी कोई द्वेष नही रहा..
पर सवाल उठता है कि आखिर प्रधानमंत्री के पद के लिए गांधी जी की पसन्द नेहरू क्यों थे??जबकि सरदार पटेल और गांधी जी.. दोनों गुजरातियों के बीच काफी गठजोड़ था..और लोग मान कैसे गए??
तो Quora पर इससे काफ़ी मिलता जुलता उदाहरण किसी ने दिया है
कि 2014 में बीजेपी के अधिकतर लोग लाल कृष्ण आडवाणी के प्रधानमंत्री बनने के पक्ष में थे पर चुना नरेन्द्र मोदी को गया प्रधानमंत्री के चेहरे के लिए... अटल जी के वख़्त भी लाल कृष्ण आडवाणी जी हिंदुत्व के काफी बड़े चेहरे थे फिर भी अटल जी को प्रधानमंत्री का चेहरा चुना गया..ऐसा क्यों??
अब 2014 वाले मोदी जी को देखें तो वे करीब 62 के आस पास थे तब और आडवाणी जी 85 के उस चुनाव के समय.. मोदी जी आडवाणी जी से काफी ज्यादा हष्ठपुष्ठ और सक्रिय थे ..इसी तरह नेहरु.. पटेल जी से लगभग 15 साल कम आयु के थे पूर्णतया स्वस्थ थे.. विदेशी मामलों में नेहरु की काफी अच्छी पकड़ थी...और वैश्विक स्तर पर काफी प्रभावशाली चेहरा भी थे .. जो कि उस वख़्त एक आज़ाद हुए देश के लिए जरूरी था... वे महत्वकांक्षी थे.. प्रगतिवादी सोंच के नेता थे... पूरे देश मे उनकी लोकप्रियता थी.. राजनीतिक करियर में नेहरु सरदार जी से लगभग 15 साल पहले से थे.. सरदार पटेल जी ने जहां एक बार जेल गए थे .. नेहरु ने करीब कुल करीब 9 सालो का वख़्त जेलों में बिताया था..
अंततः बात यही निकलकर आती है कि गांधी जी का नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने में कोई निज स्वार्थ नही था..जो भी था वो देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए था..
पर इनसब पर यकीन कैसे होगा इतिहास पढ़ेंगे नही.. क़भी खुद उन हालातों को विश्लेषित करने या उस वख़्त के भारत कि कल्पना करने का उनके पास समय नही है ना ही कबिलियत है.. तो बस यूँ ही गालियां दिए जा रहे है....संघर्ष के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले को छोड़ कर उस शख्स को नायक समझ बैठे हैं लोग जिसका कोई क्रांतिकारी इतिहास ही नही.. अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ उठाये गए दो छोटे मोटे कदम भी.. उसे नायक बनाने वाले लोग गिना नही पाएंगे...
मैंने भी गांधी जी को आलोचनात्मक नज़रिए से देखा है बल्कि एक वख़्त तक तो उन व्हाट्स फेसबुक वाले चिन्टूओ कि तरह उनके खिलाफ मन में घृणा भी रखी है..पर अज्ञानता और नादानी खत्म होते होते इस बात का मुझे एहसास हो गया... की जिस देश के लोग अपने असल नायक को बिना पढ़े बिना समझे बिना उसकी विचारधारा को आंके आलोचना करने की बजाए गालियां देने लगे..और एक खलनायक को नायक समझ बैठे उस देश की प्रगति नही हो सकती.. वो देश पीछे ही रह जायेगा.. क्योंकि यह उस देश के लोगों की मनोस्थिति और मानसिकता दशा को बतलाता है........
पर इस देश की दशा आज उतनी पिछड़ी नही है इसलिए इससे जाहिर है कि हमारे देश मे गाँधी वादी विचारधारा को सम्मान देने वाले लोग एक बड़ी संख्या में है...
और अपने दिल की कहूँ तो मुझे खुशी है की मुझमें आदर्श हैं उसूल है सिद्धान्त हैं अपनी विचारधारा के उलट वाले को सुनने और समझने की क्षमता है.. जिससे मैं किसी एक विचारधारा की गुलामी करने से आज़ाद हूँ...
महात्मा गांधी और उनके विचार अमर रहें..
महात्मा गाँधी ज़िंदाबाद..नाथूराम गोडसे मुर्दाबाद...
इंक़लाब ज़िंदाबाद... स्वदेशी एकता ज़िन्दाबाद ..
कौमी एकता ज़िंदाबाद....
लाल बहादुर शास्त्री ज़िंदाबाद......
जिसने भारतीय तो भारतीय दुसरे देश के लोगो यानी साउथ अफ्रीका के लोगों के लिए भी संघर्ष किया उनके हक के लिए लड़ा..अंगेज़ो के उनके साथ किये जा रहे भेदभाव अत्याचार और अन्याय के खिलाफ लड़ा..जो दसियों बार जेल गया..जिसें कुल 11 साल की सज़ा सुनाई गयी जिसमे उन्होंने कुल 6 साल से ज्यादा का वख़्त जेलों में बिताया...जो खुद भी अंग्रेज़ों के रंगभेद का शिकार हुआ.. मारा गया और प्रिटोरिया के स्टेशन पर डाल दिया गया..
पर उसने डरे बिना आंदोलन खड़ा किया..जो अच्छा खासा पढ़ा लिखा बन्दा आराम से चाहता तो सूट बूट पहनकर अंगेज़ों का वफादार बनके एक आराम की ज़िंदगी जी सकता था.. पर वो एक स्वदेशी धोती डालकर अपने देश की जनता की आवाज़ बना और उनके हक़ के लिए लड़ता रहा.. और आखिर तक सत्य और अहिंसा के मार्ग पर अडिग चलता रहा.. कई लोग उनकी नीतियों की आलोचना करते है सुभाषचंद्र बोस भी करते थे जिन्होंने गांधी जी को राष्ट्रपिता की उपाधि दी..भगतसिंह जी भी आलोचना करते थे.. पर इनसभी को पता था कि गांधी जी की नीतियां ग़लत हो सकती है पर इनकी नियत में कोई खोट नही है इसलिए उस वख़्त हर भारतीय के मन मे उनके लिए प्रेम था.. कहीं कोई घृणा का भाव नही था... जिसकी विचारधारा के आगे पूरी दुनिया नतमस्तक है...
आज उसे अपने घर में ही गालियां दी जाती है...
वो कहते हैं चरखे से आज़ादी नही आई ..क्या जानते हो उस चरखे के बारे में .. उस चरखे में इतनी ताकत थी जिसने फिरंगीयों की आधुनिक मशीनों को हिला रखा था... वो चरखा इस देश के आत्मसम्मान का प्रतीक था.. स्वदेशी आंदोलन की जान था.. आज जो दिन रात बाबा रामदेव टीवी पर कहते दिखाई देते हैं कि स्वदेशी अपनाओ..उस शख्स ने उसी चरखे के बल पर लोगो को स्वदेशी वस्तुओं की ताकत समझायी थी और उसे जनांदोलन बना कर लोगों के दिलों में उतार दिया था.. असल में वही असल देशद्रोही हैं जो उस चरखे को हीन भावना से देखते हैं...शायद उन्हें लगता हो ये देश गोले बारूद बंदूकों के दम पर आज़ाद हुआ है .. क्या लगता है अंग्रेज़ सक्षम नही थे??
अगर गोला बारूद के दम पर अंग्रेज़ों को भारत का भविष्य निर्धारित करना होता तो ना जाने और क्या हो चुका होता..
देश को आज़ादी उस शोर से..उस हुंकार से मिली है जिसमे हर एक स्वतंत्रता सेनानी हर एक क्रांतिकारी की चीख है..जो पूरी दुनिया सुन सकती थी..
पर इन गालियां देने वालों के दिमाग मे गांधी जी और अन्य लोगों के खिलाफ सालों तक धीरे धीरे ज़हर भरा गया है जो बचा खुचा काम था वो फोटोशॉप टेक्नोलॉजी और व्हाट्सएप्प के फॉरवर्डिंग ऑप्शन के मेल ने कर दिया....
समाज में फैलाये गए राजनीतिक प्रोपगेंडा को बल देने में इन सब का भी सहयोग रहा है...
आज इस देश के लोगों ने उसे नायक बना दिया है जिसने धर्मान्धता के आवेश में इस देश से इसका एक बहुत जरूरी मार्गदर्शक छीन लिया..जिसने उम्र के ढले पड़ाव पे भी..अंग्रेजों द्वारा किये गए अत्याचार..और अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठा रही और आज़ादी के लिए लड़ रही जनता के दलों का नेतृत्व बिना डरे किया...
इस देश को आज़ाद देखने के लिए जिसने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण अरसा समर्पित कर दिया... एक मामूली शख्स ने अपनी नफरत के अंधेपन में उस इंसान को मौत के घाट उतार दिया उसे आज़ादी की हवा को खुल के महसूस करने का मौका भी ना दिया...
मैंने नाथूराम गोडसे की मनोस्थिति और भावनात्मक उत्तेजना को बड़ी निष्पक्षता से समझा भी है कई बार लगता भी है कि गोडसे ने अज्ञानता और उत्तेजना में ऐसा किया ... एक अनसुलझी विचारधारा में बंध कर ऐसा किया...
पर उसकी ये नादानी और अज्ञानता इस देश को हानि पहुंचा गयी... देश को उस ज़हरीली विचारधारा के रास्ते पे ले गयी...जिससे आज ये देश ग्रसित है.. कहीं फस गया है..
क्या गलती थी गाँधी की..??
उन्होंने तो देश को दो हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव नही रखा था..?
हां उन्होंने विस्थापन रोकने के लिए जरूर कहा था...पर क्या कभी उस वख़्त मे जाकर सोचा है ..कभी जानने की कोशिश की है कि उस वख़्त के हालात क्या थे ..कभी कल्पना की है कि जब जगह जगह दंगे आगजनी.. मुस्लिम सिखों हिन्दुओ के बीच आपस मे पलायन को लेकर नरसंहार हो रहे हों तो इंसानियत के तौर पर सबसे पहला दायित्व क्या बनता है.. ??वो भारत के विभाजन के प्रस्ताव पर भी पूर्णताः सहमत नही थे.. और हां या ना का जिम्मा उनपर था भी नहीं..
फिर भी..जो देश बरसों बरस से अंग्रेज़ों की गुलामी अत्याचार अन्याय भेदभाव झेल रहा है उसके लिए हां करने के अलावा दूसरा कौन सा रास्ता बचता है??.. राज कर रहे अंग्रेज़ों को तो एक मौका चाहिए था ये कहने का की भारत के लोग अभी सक्षम नही है इस देश की कमान संभालने के लिए और फिर शायद बरसों बरस ग़ुलामी और प्रताड़ना झेलता ये देश...
एक और चीज़ गलती के तौर बढ़ा चढ़ा के बताई जाती है कि जब सरदार VB पटेल को 15 में से 12 वोट मिले थे तो गांधी जी ने नेहरु को प्रधानमंत्री क्यों बनाया..?
क्या उन्हें नेहरू से कोई लाभ था..??
उस पूरे हालात और वाक्या को ज़रा से शब्दों में अभिव्यक्त कर पाना बहुत मुश्किल हैं क्योंकि देश एक बड़ी लंबी गुलामी के दौर से लोकतंत्र की तरफ अग्रसर हुआ था यूँ ही किसी को गलत या सही ठहराने से अच्छा होगा उस वख़्त मे खोकर उन परिस्थितियों का विश्लेषण किया जाए और फिर कहा जाए कि हां ये सही या गलत हुआ..
पर ये बात सही है कि गांधी जी.. नेहरू को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे.. और ये इच्छा उन्होंने खुलेआम जाहिर भी की... वैसे गांधी जी कोई निर्णायक अध्यक्ष नही थे कांग्रेस के.. तो भले ही गांधी जी की राय से ही पर उस दल ने नेहरू को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकारा.. कोई बगावत नही हुई.. कोई खासा नाराज़गी भी नही थी.. सरदार वल्लभभाई पटेल जी के मन मे भी कोई द्वेष नही रहा..
पर सवाल उठता है कि आखिर प्रधानमंत्री के पद के लिए गांधी जी की पसन्द नेहरू क्यों थे??जबकि सरदार पटेल और गांधी जी.. दोनों गुजरातियों के बीच काफी गठजोड़ था..और लोग मान कैसे गए??
तो Quora पर इससे काफ़ी मिलता जुलता उदाहरण किसी ने दिया है
कि 2014 में बीजेपी के अधिकतर लोग लाल कृष्ण आडवाणी के प्रधानमंत्री बनने के पक्ष में थे पर चुना नरेन्द्र मोदी को गया प्रधानमंत्री के चेहरे के लिए... अटल जी के वख़्त भी लाल कृष्ण आडवाणी जी हिंदुत्व के काफी बड़े चेहरे थे फिर भी अटल जी को प्रधानमंत्री का चेहरा चुना गया..ऐसा क्यों??
अब 2014 वाले मोदी जी को देखें तो वे करीब 62 के आस पास थे तब और आडवाणी जी 85 के उस चुनाव के समय.. मोदी जी आडवाणी जी से काफी ज्यादा हष्ठपुष्ठ और सक्रिय थे ..इसी तरह नेहरु.. पटेल जी से लगभग 15 साल कम आयु के थे पूर्णतया स्वस्थ थे.. विदेशी मामलों में नेहरु की काफी अच्छी पकड़ थी...और वैश्विक स्तर पर काफी प्रभावशाली चेहरा भी थे .. जो कि उस वख़्त एक आज़ाद हुए देश के लिए जरूरी था... वे महत्वकांक्षी थे.. प्रगतिवादी सोंच के नेता थे... पूरे देश मे उनकी लोकप्रियता थी.. राजनीतिक करियर में नेहरु सरदार जी से लगभग 15 साल पहले से थे.. सरदार पटेल जी ने जहां एक बार जेल गए थे .. नेहरु ने करीब कुल करीब 9 सालो का वख़्त जेलों में बिताया था..
अंततः बात यही निकलकर आती है कि गांधी जी का नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने में कोई निज स्वार्थ नही था..जो भी था वो देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए था..
पर इनसब पर यकीन कैसे होगा इतिहास पढ़ेंगे नही.. क़भी खुद उन हालातों को विश्लेषित करने या उस वख़्त के भारत कि कल्पना करने का उनके पास समय नही है ना ही कबिलियत है.. तो बस यूँ ही गालियां दिए जा रहे है....संघर्ष के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले को छोड़ कर उस शख्स को नायक समझ बैठे हैं लोग जिसका कोई क्रांतिकारी इतिहास ही नही.. अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ उठाये गए दो छोटे मोटे कदम भी.. उसे नायक बनाने वाले लोग गिना नही पाएंगे...
मैंने भी गांधी जी को आलोचनात्मक नज़रिए से देखा है बल्कि एक वख़्त तक तो उन व्हाट्स फेसबुक वाले चिन्टूओ कि तरह उनके खिलाफ मन में घृणा भी रखी है..पर अज्ञानता और नादानी खत्म होते होते इस बात का मुझे एहसास हो गया... की जिस देश के लोग अपने असल नायक को बिना पढ़े बिना समझे बिना उसकी विचारधारा को आंके आलोचना करने की बजाए गालियां देने लगे..और एक खलनायक को नायक समझ बैठे उस देश की प्रगति नही हो सकती.. वो देश पीछे ही रह जायेगा.. क्योंकि यह उस देश के लोगों की मनोस्थिति और मानसिकता दशा को बतलाता है........
पर इस देश की दशा आज उतनी पिछड़ी नही है इसलिए इससे जाहिर है कि हमारे देश मे गाँधी वादी विचारधारा को सम्मान देने वाले लोग एक बड़ी संख्या में है...
और अपने दिल की कहूँ तो मुझे खुशी है की मुझमें आदर्श हैं उसूल है सिद्धान्त हैं अपनी विचारधारा के उलट वाले को सुनने और समझने की क्षमता है.. जिससे मैं किसी एक विचारधारा की गुलामी करने से आज़ाद हूँ...
महात्मा गांधी और उनके विचार अमर रहें..
महात्मा गाँधी ज़िंदाबाद..नाथूराम गोडसे मुर्दाबाद...
इंक़लाब ज़िंदाबाद... स्वदेशी एकता ज़िन्दाबाद ..
कौमी एकता ज़िंदाबाद....
लाल बहादुर शास्त्री ज़िंदाबाद......
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