हमारी प्रकृति
(कई बार मैं जो पोस्ट FB पर डालता हूँ उसे ही सेम टू सेम ब्लॉग पर डाल देता हूँ.. ये वहीं का है.. तो बहुत सजा सवार नही पाया)
ये मैं 17 अप्रैल को महाराष्ट्र के पालघर में बच्चा चोरी के शक में हुई साधुओं की मोब लिनचिंग के उपलक्ष में लिखना चाह रहा था.. लिखते लिखते पता नही कब मन किया कि कुछ और भी जोड़ दूं
-
तो
अगर तुम्हें किसी के मरने पिटने पर दया और करुणा भी धर्म या जाति देखकर आती है तो तुम्हे जरूरत है खुद के अंदर झांक कर देखने की..
तुम एक अच्छे तालाब की गंदी मछली हो सकते हो..
तुम समाज में रहने के काबिल नही हो..
इंसानियत के नज़रिए से तुमने कभी कुछ नही सोचा है हमेशा मतलब के लिए सोचा है और दिखावा करने के लिए सोचा है..
…............................................................................
तुम एक अच्छे तालाब की गंदी मछली हो सकते हो..
तुम समाज में रहने के काबिल नही हो..
इंसानियत के नज़रिए से तुमने कभी कुछ नही सोचा है हमेशा मतलब के लिए सोचा है और दिखावा करने के लिए सोचा है..
…............................................................................
मैं भी ऐसा ही रहा होऊंगा शायद कभी.. पर अभी तो नही हूँ.. और जब भी जरूरत पड़ी पहले ख़ुद को बदलूंगा.. अग़र ख़ुद ना नज़र गयी तो अपने आलोचकों की मदद लूंगा.. उन्हें सुनूंगा..समझूंगा...
ख़ुद को बदलना ही समय के साथ चलना होता है..
जो लोग परिवर्तन की इच्छा रखते है.. वो ही इस प्रकृति के सपूत है.. और बाकी सारे कपूत.. प्रकृति ही सब कुछ है.. ये आपके जज्बातों .. भावों.. के हिसाब से नही चलती पर इसके ढांचे में अगर आप फिट बैठते हो तभी आपको लगता है की आपके साथ कुछ अच्छा हो रहा है..कोई आपकी सुन रहा है.. कोई ऊपर वाला है हमारे बीच...आपकी उम्मीदें खरी उतर जाती हैं.. और फिट नही बैठते तो आपको लगता है शायद हमने कोई पाप किया है ..
पर दरअसल आप.. "पाप" को कोई अदृश्य शक्ति की अदृश्य किताब के हिसाब किताब में दर्ज कोई आंकड़ा समझ लेते हो या शायद कोई पैमाना .. और लग जाते हो अजीब नाज़ायज़ गैर जरूरी आडम्बरो से उसे सुधारने में... गौर ही नही करते कि दर असल गलती है क्या .. पाप जैसी कोई चीज़ ही नही है.. बस आपने कोई गलती की है जिससे आप प्रकृति के परिमंडल (इकोस्फेयर)..या प्रकृति के एक अंग..समाज के ढांचे में फिट नही हो रहे...
कई बार कोई गलती भी नही होती.. मगर आप उसके चक्र को समझ नही पाते.. कोई चीज़ नज़रअंदाज़ हो जाती है.. या फिर छूट जाती है.. जो कि बहुत सामान्य सी बात है.. और तब भी आप प्रकृति के परिमंडल या समाज के ढांचे में फिट नही बैठते..
और समाज से मेरा मतलब सिर्फ कुछ लोगों का या परिवारों का समूह नही है..बल्कि ये पुरी दुनिया भी एक समाज है.. जिसे आप अपने आस पास के लोगों को भी समेट कर बोल सकते या बोलते है..
जो लोग परिवर्तन की इच्छा रखते है.. वो ही इस प्रकृति के सपूत है.. और बाकी सारे कपूत.. प्रकृति ही सब कुछ है.. ये आपके जज्बातों .. भावों.. के हिसाब से नही चलती पर इसके ढांचे में अगर आप फिट बैठते हो तभी आपको लगता है की आपके साथ कुछ अच्छा हो रहा है..कोई आपकी सुन रहा है.. कोई ऊपर वाला है हमारे बीच...आपकी उम्मीदें खरी उतर जाती हैं.. और फिट नही बैठते तो आपको लगता है शायद हमने कोई पाप किया है ..
पर दरअसल आप.. "पाप" को कोई अदृश्य शक्ति की अदृश्य किताब के हिसाब किताब में दर्ज कोई आंकड़ा समझ लेते हो या शायद कोई पैमाना .. और लग जाते हो अजीब नाज़ायज़ गैर जरूरी आडम्बरो से उसे सुधारने में... गौर ही नही करते कि दर असल गलती है क्या .. पाप जैसी कोई चीज़ ही नही है.. बस आपने कोई गलती की है जिससे आप प्रकृति के परिमंडल (इकोस्फेयर)..या प्रकृति के एक अंग..समाज के ढांचे में फिट नही हो रहे...
कई बार कोई गलती भी नही होती.. मगर आप उसके चक्र को समझ नही पाते.. कोई चीज़ नज़रअंदाज़ हो जाती है.. या फिर छूट जाती है.. जो कि बहुत सामान्य सी बात है.. और तब भी आप प्रकृति के परिमंडल या समाज के ढांचे में फिट नही बैठते..
और समाज से मेरा मतलब सिर्फ कुछ लोगों का या परिवारों का समूह नही है..बल्कि ये पुरी दुनिया भी एक समाज है.. जिसे आप अपने आस पास के लोगों को भी समेट कर बोल सकते या बोलते है..
आपका स्वभाव..आपके सिद्धांत..आपके नैतिक विचार.. आपके भाव. . प्रकृति के अनुकूल होना चाहिए उसके नियम से कहीं हद तक मेल खाने चाहिए..
फिर आप खुद को प्रकृति से.. इस समाज से..इस दुनिया से.. यहां के पेड़ पौंधों से.. जीव जंतुओं से.. ख़ुद को जुड़ा महसूस करेंगे.. ख़ुद को खुला महसूस करेंगे.. कभी आसमान आपको बहुत दूर नही लगेगा.. धरती का केंद्र आपको खुद के करीब लगेगा... आपकों सन्यास की जरूरत नहीं लगेगी.. आप चलते हुए भी खुद की एक दुनिया होंगे.. जिस तरह पानी का एक घड़ा भी खुद में एक समंदर सा अस्तित्व रखता है..
फिर आप खुद को प्रकृति से.. इस समाज से..इस दुनिया से.. यहां के पेड़ पौंधों से.. जीव जंतुओं से.. ख़ुद को जुड़ा महसूस करेंगे.. ख़ुद को खुला महसूस करेंगे.. कभी आसमान आपको बहुत दूर नही लगेगा.. धरती का केंद्र आपको खुद के करीब लगेगा... आपकों सन्यास की जरूरत नहीं लगेगी.. आप चलते हुए भी खुद की एक दुनिया होंगे.. जिस तरह पानी का एक घड़ा भी खुद में एक समंदर सा अस्तित्व रखता है..
जैसे चलना है चलिए.. हँसिये.. मुस्कुराइए.. लड़िये.. झगड़िये.. गुस्साईये.. गलती करिए.. डाँटिये.. मगर प्रकृति के कुछ मौलिक नियम हैं.. ज्यादातर या सामान्य तौर आप जिनके हिसाब से चलते भी हो.. मगर आपको हमेशा ही इसका पालन करना होगा..अपनी जरूरत..अपनी खुशी..अपनी संतुष्टि.. अपने पक्ष के मुताबिक बदलना नही हैं..
ये बातें मामूली है पर समझ से परे हैं.. और फिर भी समझ आ गई.. तो खुद में एक बहुत बड़ा बदलाव महसूस करेंगे .. ये बातें आपके अपने जीवन और सामाजिक जीवन दोनों के लिए जरूरी हैं...जरूरी पॉइंट्स ढूँढिये..
और फिर रईस हों जाएंगे..गाड़िया बंगला बैंक बैलेंस होगा.. ?
तो ऐसा जरूरी नही की होगा..
क्योंकि रईसियत इंसान का कांसेप्ट है प्रकृति का नही ... 😉
तो ऐसा जरूरी नही की होगा..
क्योंकि रईसियत इंसान का कांसेप्ट है प्रकृति का नही ... 😉
#एक_ख़्याल_सा
Comments
Post a Comment