An Atheist In A Temple



जय हिन्द

  यह मेरा पहला ऐसा ब्लॉग होगा जिसे मै डिजिटल लेटर्स में कन्वर्ट करूंगा और पब्लिश करूंगा, हिंदी में है इसलिए माफ़ी चाहूंगा अगर मेरे हिंदुस्तानी लोगो को पढ़ने और समझने में दिक्कत हो या अजीब लग रहा हो, वैसे बता दूँ की इस ब्लॉग का नाम 'An Atheist in a Temple' इसलिए रखा है क्योंकि ये वाक्य मुझे पता नहीं क्यों प्रभावित करता है पहले भी कई बार इस टाइटल पर कुछ लिखने की सोचा पर लिख नहीं पाया और संयोगवश आज यानि 28 सितम्बर को शहीद भगत सिंह जी के जन्मदिन पर उन्ही के एक लेख "मै नास्तिक क्यों हूँ" पढ़ते हुए और समझते हुए लिखने की इच्छा हुयी तो वही अपना पसंदीदा टाइटल चुन लिया, जैसा की टाइटल से ही साफ़ है ब्लॉग किस चीज़ पर है तो कई लोग ये सोच सकते है की ये भी आ गए अपने अलग फैक्ट लेकर अलग राग अलापने, तो बता दूँ की मेरे पास ऐसे कोई तथ्य नहीं है जिससे मै भगवान् की भ्रान्ति दूर कर सकूं और मै मानता हूँ की जो 60, 40, 20 या जितनी भी उनकी उम्र है यह भ्रान्ति तबसे उनमें पनपती आ रही है तो मै इसे कुछ ही शब्द में खत्म हो जाने वाले एक ब्लॉग से कैसे दूर कर सकता हूँ पर फिर भी एक ऐसा चक्र है जिसमे आप हम और हमारा देश एक साथ चल रहे है तो आपकी सोच, हमे और इस देश को भी प्रभावित करती है, यहाँ की उन्नति और लोगो के अच्छे और बुरे को प्रभावित करती है और हमारे देश हिंदुस्तान जिसके नाम में ही धर्म जुड़ा है,(हालांकि धर्म और भगवान् भी दो चीज़े है पर अभी इसे एक ही लेकर चलते है) हमारे यहाँ राजनीतिक लगाव भी अच्छाइयों और बुराईओं पर नहीं धर्म पर निर्भर करता है, आधे से ज्यादा आबादी युवाओ की है और मैं जिस पिछले स्तर के बीच रह कर धर्म को या उससे जुड़े अन्धविश्वास को लोगो के दिमाग पर जंक की तरह लगा हुआ देख रहा हूँ तो एक बार इस पर विचार साझा करना जरूरी लगता है



एक बात ये भी बताना चाहूंगा की सच कटु के साथ ही निराशावादी और ज्यादातर नकारात्मक भी होता है पर जो 'सच' पसंद करते है वो झूठ के साथ जीने से अच्छा सच के साथ मर जाना पसंद करते है संयोग की बात है की भगवान् को मानने वाला एक सन्यासी भी सत्य की तलाश में सन्यास पर निकलता है और एक सच्चा नास्तिक भी सत्य को परखते हुए ही नास्तिक बनता है, एक सन्यासी का जीवन कितना निःस्वाद होता है कोई मोह माया नहीं, और एक नास्तिक जिसकी तो आखिरी उम्मीद भी वो खुद मिटा चुका होता है, अकेले अगर कहीं बैठ कर अपने दुःख दर्द का चिंतन कर रहा है तो कौन दूसरा उसे सुन रहा है, एक सन्यासी अंततः समाधि का विचार करता है और एक नास्तिक!! वो तो उसकी परिस्थिति पर निर्भर करता है 🙂



एक मज़ाक की बात कहूँ तो मुझे लगता है ये "ऊपर वाला" शब्द यानि भगवान की उत्पत्ति भी किसी नास्तिक ने अपनी बेस्वाद ज़िंदगी से तंग आकर की होगी, 😄 पर फिर भी एक नास्तिक के पास खुश रहने के बहुत से कारण होते है ऐसा नहीं है वो नकरात्मक ही रहता है हर वख्त, वो हर चीज़ हर दिन हर फैस्टिवल आडम्बरो से हटकर ख़ुशी के लिए सेलिब्रेशन की तरह देख सकता है, उसे अपनी ज़िंदगी के बाद की ज़िंदगी की कम से कम कोई फिक्र नहीं होती |



अब आगे मैं अपनी बात करूंगा "मै नास्तिक कैसे बन गया" बता दूँ की मै एक ऐसी फैमिली में पला बड़ा हूँ जहाँ नास्तिक होना भी पाप माना जाता था, ;)😉 "राक्षस प्रवृत्ति" शब्द से तो आप बखूब ही वाकिफ होंगे, जन्म के कुछ महीनो बाद ही किसी कारणवश ननिहाल शिफ्ट हुआ जहाँ मेरे बचपन में ही भक्तिमय माहौल था की सुबह ५ बजे उठना, पूजा करना, सुबह मंदिर जाना, रसोईघर में नहाने के बाद ही पैर रखना, फिर शाम को मंदिर जाना वहां मेरी परनानी जी यानि Great-Grand-Mother ने मुझे कई सारे दोहे और भक्ति वाली पंक्तिया रटा दी थी जो मै मंदिर में बोलता था रोज, जिसमें से एक मै आज भी जब बोलता हूँ तो nostalgic फील होता है " बजरंग बली मेरी नाव चली, जरा बल्ली कृपा की लगा देना, मुझे रोग ने शोक ने घेर लिया, मेरे पाप को नाथ मिटा देना" और ऐसे बहुत सी चीज़े जो आज भी मेरे लिए मायने तो रखती है पर सिर्फ यादो की तरह, जिनसे मुझे उस वख्त खुद भी बहुत ज्यादा लगाव था, मेरा शहर यु पी का एक डिस्ट्रिक बहराइच जहाँ पूरे भारत की अलग अलग पूजन शैलियों को एक ही जगह देखा जा सकता था, जहाँ हर दूसरे दिन किसी घर में भगवद बैठी होती, कहीं शुक्रवार को संतोषी माता का भजन चल रहा होता, कहीं शनिवार को सुन्दरकाण्ड तो कहीं रामायण, जहाँ हर गली हर चौराहे पर एक मंदिर, एकादशी पूर्णिमा अमावस्या सावन तीज जन्माष्ट्मी, गणेश मूर्ति पूजन, दुर्गा मूर्ति पूजन हर त्यौहार वहां दस दस दिन चलता था, दस दस दिन तक पूरा शहर सज़ा होता था हर चौराहे पर डीजे लगा होता था और शायद अभी भी चलता है चौदह की उम्र आते आते मै भी भगवान् से ऐसा जुड़ चूका था की दो दो - घंटे पूजन करता, सुंदरकांड पढता था, नवरात्री के नौ दिन छोड़ कर बाकी सारे व्रत रहता, मूर्ति विसर्जन में खुलकर एकदम भक्ति भाव से नाचता था, जिस दिन व्रत रहता उस दिन तो ऐसा की टूथ पेस्ट से ब्रश करना भी अजीब लगता, शक्कर भी खाने से पहले ये सोचता की वो भी शुद्ध तरीको से नहीं बनती, पूजा आरती तो एकदम ऐसे चित्त होकर करता जैसे खुद भगवान् ने पूरा प्रॉसेस मुझे बताया हो की क्या कैसे कब करना है, 

     अब थोड़ा विश्राम लीजिये जाईये टहल कर आईये खा पीकर थोड़ा सोचिये और बताईये की एक ऐसा इंसान किस तरह इन सब से इतना आगे निकल आया की उसे किसी को शुभकामनाये देना भी एक फॉर्मेलिटी लगती है न अब वो मंगल मानता है न बृहस्पति न शनि, कभी मंदिर का रुख भी नहीं करता, उसे वो लोग अब अजीब लगने लगे है जो 23 की उम्र के बाद भी भगवान् में विश्वास रखते है, खैर नास्तिक बनने का सफर, अपने विचार और देश में इन सब की जरूरत अगले हिस्से में बताऊंगा, बात छोटी है पर बताऊंगा की अभी दो दिन पहले ही मेरी स्कूटी मंदिर के आगे क्यों रुकी थी, शहीद भगत सिंह जी मेरे आदर्श की तरह है और धार्मिक भाषा में कहूँ तो आज का दिन मेरे लिए पवित्र था और इस हिस्से की शुरुवात करनी थी इसलिए जल्दी जल्दी में शब्दों को सज़ा नहीं पाया.

एक बात और मै मार्क्स लेनिन, त्रात्स्की या किसी महापुरुष के विचारो से प्रभावित होकर नास्तिक नहीं बना, मुझमे पहले नास्तिकता आयी फिर मै इन सभी के विचारो से प्रभावित हुआ

"अंधेरो ने मुझे अंधेरो से बचाया"

Comments

Popular posts from this blog

हमारी प्रकृति

भगत सिंह और उनकी अधूरी क्रांति

गाँधी कौन????